१९८०-८९ का दशक हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में एक विवादास्पद काल रहा। एक ओर जहाँ यह दशक संगीत के नए प्रयोगों के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर पुरानी परंपराओं को तोडने वाला भी। इस दशक के शुरुआती वर्षों में डिस्को की लहर ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया। इस क्रांति के प्रणेता थे बप्पी लाहिरी और नाजिया हसन - जिन्होंने सिंथेसाइजर और क्रमबद्ध तालों को भारतीय संगीत के केन्द्र में ला खडा किया।
इस दशक के गीत अब जटिल शास्त्रीय रचनाओं के बजाय लय और दृश्य चमक-धमक पर अधिक निर्भर हो गए। गीतों के अंतरे छोटे, अधिक आकर्षक और सरल हो गए। ड्रम मशीनों और सिंथेसाइजरों के भारी प्रयोग ने एक ऐसी बेरोक शैली को जन्म दिया, जो पहले कभी हिंदी सिनेमा ने नहीं देखी थी। यह वह समय था जब व्यावसायिक सफलता और युवाओं की पसन्द ने शास्त्रीय गहराई पर साफ वरीयता पा ली। इस परिवर्तन के पीछे भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत और पश्चिमी मीडिया की बढती धाक भी एक बडा कारण थी।
जैसे ही सिनेमा में 'एक्शन युग' ने पैर जमाए, संगीत की मधुरता पर गहरा संकट आ गया। अनेक संगीत प्रेमियों ने यह शिकायत की कि अब सुरीली धुनों का स्थान ऊँची आवाज और बनावटी रचनाओं ने ले लिया है। कुछ समय के लिए ऐसा लगा मानो हिंदी फिल्म गीत अपनी रूह खो बैठा हो। यह संगीत का एक म्लान दौर था, जिसमें भावना से अधिक शोरगुल अपनी जगह बनाने लगा था।
किंतु १९८८ में एक फिल्म आई - कयामत से कयामत तक। इस फिल्म ने मानो संगीत पर एक नई सुबह की रौशनी बिखेर दी। अचानक मासूम प्रेम के गीत लौट आए, धुनों में सादगी और कोमलता आ गई। इसने एक 'संगीत पुनर्जागरण' की शुरुआत कर दी, जिसने आने वाले नब्बे के दशक के भव्य ऑर्केस्ट्रल गीतों का मार्ग प्रशस्त किया। यह वह मोड था जब संगीत ने फिर से अपनी अंतरात्मा को पहचाना।
अस्सी का दशक केवल संक्रमण का ही नहीं, बल्कि नई आवाजों के सुंदर आगमन का भी साक्षी रहा। अनुराधा पौडवाल, कविता कृष्णमूर्ति और अलका याज्ञिक ने अपनी विशिष्ट शैलियों के साथ इस दशक के संगीत में नई ताजगी भरी। उनके कोमल और सुरीले स्वरों ने उस दौर की धुनों को और अधिक विविधतापूर्ण बना दिया, और चुपचाप इस दशक के ध्वनि-परिदृश्य को नया आकार दिया।
१९९० के पूर्व के दशक की सबसे धमाकेदार फिल्मों ने इस युग की ऊर्जा और विविधता को समेटा। कुरबानी, रॉकी, करज़, लावारिस, याराना, उमराव जान, लव स्टोरी, एक दूजे के लिए, सिलसिला, खुद्दार, डिस्को डांसर, निकाह, सत्ते पे सत्ता, प्रेम रोग, हीरो, मासूम, नगीना, मिस्टर इंडिया, तेजाब, चाँदनी, कर्मा, नमक हलाल, मैंने प्यार किया, और कयामत से कयामत तक — ये वे चित्रपट हैं जिन्होंने इस दशक को उसकी सारी चमक, शोर और कोमलता के साथ अमर कर दिया।
• फिल्म संगीत के सुरीले नगमें :




















