संगीत की दुनिया में गज़ल का एक अपना विशेष स्थान है। गज़ल अक्सर एक जख्म-ए-जिगर की कहानी को बयां करती है, जिसमें होती है जुदाई की व्यथा और तन्हाई का दर्द। गज़ल रुह से निकलनेवाली वो आह है जो तरल सुरों के पंख पर सवार होकर सुनने वाले के भी रुह को भी छू जाती है। गज़ल गायकी को फिल्मी संगीत जैसी लोकप्रियता भले ही न मिली हो, फिर भी समर्पित संगीत प्रेमियों के दिलों में इनका एक विशेष स्थान है। आपकी पसंदीदा गज़लों का चयन करें और इन रूहानी लफ्जों की दुनिया में आपका खोया हुआ सुकून ढूंढने की कोशिश करें!
आइये इस गज़लों की महफिल का हिस्सा बनें और अपनी शिरकत से इस शाम को एक यादगार और हसीन तजुर्बा बनाएँ!
गज़ल एक ऐसा मखमली अहसास है, जिसकी रूहानी महक दिलों को छू लेती है। गायक की पुरसुकून और जज्बातों में डूबी आवाज़ रूह में उतरकर एक अलग ही समां बांध देती है। हर शेर की गहराई में खोया हुआ श्रोता मंत्रमुग्ध होकर बस उसी सुरीली तन्हाई और सुकून को जीता है।
गज़ल की उत्पत्ति अरबी कविता से हुई है लेकिन भारतीय उपखण्ड में ऐसे कई प्रभावशाली गायक हुए जिनके भावपूर्ण और तरल सुरों ने इस उर्दू काव्य प्रकार को हमारे यहाँ संगीत प्रेमियों में काफी लोकप्रिय कर दिया। इस का श्रेय जाता है जगजीत सिंह, पंकज उधास, गुलाम अली, अनूप जलोटा, मेहदी हसन, बेगम अख्तर जैसी कई भावपूर्ण आवाजों को जिनमें व्यक्त होनेवाला एक अजीब सा सुकून, दर्द की गहराई और मखमलीपन सुनने वाले को सम्मोहित कर देती है और 'वाह' 'वाह' करने को विवश कर देती है!
इन गज़लों में फिल्मी तथा गैर-फिल्मी दोनों प्रकार की गज़लें शामिल हैं , लेकिन इन दो काव्य प्रकारों में कौन सा अधिक लोकप्रिय है यह बताना बडा ही कठिन है।
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