१९४७ में भारत की आजादी से पहले ही यहाँ के फिल्मी संगीत ने जनमानस पर अपनी मोहिनी डाल दी थी। चालीस का दशक हिंदी सिनेमा के संगीत के लिए वह सुनहरा समय था, जब हर धुन भारतीय शास्त्रीय संगीत की गोद में पल रही थी। गीतों में ठुमरी की ठसक, खयाल की गहनता और दादरे की कोमलता झलकती थी, मानो संगीत स्वयं नाटकीय मुद्राओं में सजा हो। वाद्यों का दायरा उस दौर में सीमित था - हारमोनियम की सादगी, सारंगी की करुण पुकार और तबले की थिरकन ही मुख्य सहारा थे, फिर भी इन्हीं में समा जाता था संगीत का संपूर्ण संसार।
के. एल. सहगल उस युग के पुरुष गायकों में अकेले ताज थे, जिनकी अनुनासिक शैली ऐसी अनूठी थी कि हर गायक उनकी नकल करने को बेचैन रहता था। नूरजहाँ और सुरैया नारी स्वर के वे सितारे थे, जिनकी आवाज में कोमलता और दिलकशी दोनों समाई थी। संगीतकारों में गुलाम हैदर, अनिल बिस्वास, खेमचंद्र प्रकाश और नौशाद ने वह बुनियाद रखी, जिस पर बाद के दशकों का संगीत महल खडा हुआ।
उन दिनों अभिनेताओं को उनके अभिनय कौशल से अधिक उनकी गायन क्षमता के बल पर चुना जाता था, क्योंकि वे ही गीतों को अपने मुख से गाते थे। किंतु जैसे-जैसे रिकार्डिंग तकनीक विकसित हुई, वैसे-वैसे पार्श्वगायन का वह नया आयाम खिलता गया, जिसने कलाकारों को अभिनय और गायन के अलग-अलग आकाश दे दिए। और इसी दशक के अंतिम पडाव में लता मंगेशकर का उदय हुआ - उनका पदार्पण ऐसा था मानो संगीत की दुनिया में एक नई सुबह आ गई हो, जहाँ अधिक परिष्कृत, अधिक मधुर और अधिक संवेदनशील गायकी को प्राथमिकता मिलने लगी।
उस श्वेत-धवल युग की ये फिल्में आज भी सुरों के पन्नों पर सजी हैं — अनमोल घडी, किस्मत, शहीद, बरसात, महल, रतन, नदिया के पार, जिंदगी, होली, डाक्टर, चाँद, तानसेन, भक्त सुरदास और जवाब। ये वे कथाएँ और धुनें हैं, जिन्होंने हिंदी फिल्म संगीत की नींव में अपना अमिट गीत लिख दिया।
• फिल्म संगीत की सुरीली धरोहर से :




















