१९६०-६९ का दशक आया तो संगीत के वाद्य और अधिक समृद्ध हुए, किंतु मधुरता ने अपना केन्द्रीय स्थान कभी नहीं खोया। हिंदी सिनेमा का हर अंग - कथा, संवाद, संगीत, अभिनय - अपने चरम पर पहुँच गया। इस दशक में बॉलीवुड ने अपनी भारतीय आत्मा को ज्यों का त्यों संजोए रखा, और फिर भी पश्चिमी लोकप्रिय संगीत से गहरा नाता जोड़ लिया। यही अद्भुत समन्वय था जिसके कारण रोमांटिक और चंचल गीतों के साथ-साथ शास्त्रीय रागों पर आधारित रचनाएँ भी उतनी ही लोकप्रिय रहीं।

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ओ. पी. नैयर की लयप्रधान शैली ने इस दशक में एक अलग पहचान बनाई। उन्होंने जानबूझकर शास्त्रीयता से दूरी बनाए रखी और एक ऐसा तीव्र, ठसकदार संगीत दिया जिसने युवाओं के दिल डोलने लगें आशा भोंसले अपनी बहुआयामी और अभिनव आवाज के बल पर पश्चिमी शैली के हिंदी फिल्म संगीत की निर्विवाद सम्राज्ञी बन गईं। उधर और किशोर कुमार की चुलबुली, योडलिंग शैली ने न जाने कितनी बार थिएटरों में 'वन्स मोर' की माँग पूरी की।

इसी दशक में मदन मोहन ने गजल विधा को वह ऊँचाई दी, जहाँ से वह आज तक नीचे नहीं उतरी। उनकी रचित गजलें आज भी किसी श्रृंगार या विरह की धूप में सराबोर होकर रूह को छू जाती हैं। और रोशन ने कव्वालियों को इतना परिष्कृत और दिलकश बनाया कि वे हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर हो गईं। यह दशक उन संगीतकारों का भी था, जिन्होंने शास्त्रीयता और लोकधर्मा का मिलन कराया।

कृष्ण-धवल से रंगीन सिनेमा की ओर हो रहे परिवर्तन के साथ साथ संगीत भी और अधिक मधुर, सजीव और रंगीन होता गया। मोहम्मद रफी की बहुआयामी आवाज ने हर संगीत प्रेमी के दिल पर छा गयी - वे शास्त्रीय गीतों से लेकर ऊर्जावान पश्चिमी शैली के गीतों तक क्या खूबी से गाया करते थे। "शम्मी कपूर शैली" की उत्साहपूर्ण, लयबद्ध, बेबाक नृत्य शैली ने न केवल युवा दिलों को प्रभावित किया बल्कि संगीतकारों को भी जिन्होंने ऐसे गीत रचें जो केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि थिरकने और झूमने के लिए हों।

१९७० के पूर्व के इस सुनहरे सांगीतिक दशक को अनेक उत्कृष्ट कृतियों ने संजोया। मुगल-ए-आजम, पारसमणि, चौदहवीं का चाँद, संगम, गाइड, आराधना, बरसात की रात, दोस्ती, वक़्त, उपकार, दो रास्ते, ज्वेल थीफ, पडोसन, गंगा जमुना, जंगली, हम दोनों, बंदिनी, कश्मीर की कली, मेरा साया, तीसरी मंजिल, राम और श्याम, एन इवनिंग इन पेरिस — ये वे फिल्में हैं, जिनके गीत आज भी हमारी यादों के आंगन में दीपक की तरह जलते हैं।

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