१९५० से १९५९ का दशक बॉलीवुड संगीत का वह स्वर्णिम काल है, जिसे आज भी हर कोई बेमिसाल मानता है। इस दशक में वह परिवर्तन पूरा हो चुका था, जब अभिनेता अपने गीत स्वयं गाने की परंपरा से निकलकर समर्पित पार्श्वगायकों के दौर में प्रवेश कर चुके थे। इस बदलाव ने गायन की गुणवत्ता को जो नया आयाम दिया, उसका श्रेय अकेले नौशाद को जाता है - उन्हीं के हाथों यह क्रांति साकार हुई।
लता मंगेशकर इस दशक में नारी स्वर की अकेली साम्राज्ञी बनकर उभरीं। उनकी वह निर्मल, सुरीली और आसमानी आवाज पूरे युग की पहचान बन गई। और उन्हीं के समकक्ष इस दौरान लता जी के आवाज से मिलती-जुलती एक और नाजुक और मीठी आवाज सामने आयी, जिसे समीक्षक आज भी अक्सर लता मंगेशकर के बराबर मानते है, जिसका नाम था - सुमन कल्याणपूर। रफी की बहुरंगी प्रतिभा, मुकेश की करुण पुकार, महेंद्र कपूर का बुलंद जोश, तलत की मखमली नजाकत और हेमंत कुमार की गंभीर मधुरता ने मिलकर संगीत के आंगन को सुरों के इंद्रधनुषी रंगों से सराबोर कर दिया।
नौशाद ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ पश्चिमी स्ट्रिंग ऑर्केस्ट्रा का अनूठा और अद्भुत मेल रचा। एस डी बर्मन और शंकर-जयकिशन ने ऐसी मधुर धुनें गढी, जो आज भी रसिकों के दिल में बसी हैं। इस दशक के संगीत की विशेषता थी — जटिल रागों पर आधारित धुनें, शानदार स्ट्रिंग व्यवस्था, और भारत की लोक परंपराओं का सहज मिलन। यह कलात्मक क्रांति का युग था, गीत काव्यात्मक और अर्थपूर्ण हो गये, गानों में कहानी का अक्सर प्रतिबिम्ब दिखाई पडता यहीं से शुरू हुई उन कालजयी धुनों की परंपरा, जो आज भी अमर हैं।
प्यासा, आवारा और बैजू बावरा जैसी फिल्मों ने हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे अजरामर गीतों की रचना की, जिन्हें समय की धूल भी मिटा नहीं पाई।
१९६० के पूर्व के इस दशक को स्मरणिय करने वाली ऐतिहासिक फिल्मों में शामिल हैं: श्री ४२०, मदर इंडिया, अलबेला, दाग, आवारा, प्यासा, नया दौर, मधुमती, बैजू बावरा, नागिन, चलती का नाम गाडी, अनाडी, कागज के फूल, सी आई डी, चोरी चोरी, जागते रहो, सुजाता।
• फिल्म संगीत की सुरीली सरगम से :




















